बाजी मार ले गए शिवराज

बाजी मार ले गए शिवराज

दिनेश निगम ‘त्यागी’ भोपाल
अंतत: शिवराज सिंह चौहान चौथी पर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए। इस बार न उनकी डगर आसान है, न चुनौतियां कम। यह उन्हें नेता चुनने में हुई देर से भी पता चला। नेतृत्व को लेकर कोई संकट नहीं होता तो कमलनाथ सरकार के जाते ही शिवराज के नाम की घोषणा हो जाती, पर ऐसा नहीं हुआ। नाम तय करने में पार्टी को कई दिन लग गए। मुख्यमंत्री पद के लिए आधा दर्जन नाम प्रमुख दावेदार के तौर पर उभरे। इनमें केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, थावरचंद गहलोत, नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव, पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय, पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा तथा प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा के नाम प्रमुख हैं। दो दिन से चर्चा थी कि श्री तोमर का नाम लगभग तय हो गया है। खबर यह भी थी कि नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी काम की अपनी शैली के मुताबित किसी नए व अप्रत्याशित नाम पर मुहर लगा सकती है। ऐसा भी नहीं हुआ। सोमवार को अचानक शिवराज का नाम तय होने की खबर आ गई। सवाल यह है कि आखिर, दिग्गज दावेदारों को पीछे छोड़कर शिवराज ने एक बार फिर बाजी कैसे मार ली।
– आगे होने के बाद पीछे हो गए थे शिवराज
कमलनाथ द्वारा मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के तत्काल बाद मुख्यमंत्री के तौर पर शिवराज का नाम ही आगे था। कहा गया था, उनके नाम पर सहमति बन गई है। शाम तक विधायक दल उन्हें नेता चुन लेना और वे शपथ लेंगे। इसके बाद वे पीछे हो गए। तर्क दिया गया, पार्टी में उनके नाम पर सहमति नहीं बन पा रही है। इसलिए केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर मुख्यमंत्री बनेंगे। 23 को विधायक दल की बैठक होगी और 25 को तोमर शपथ ले लेंगे। अचानक खबर आई कि विधायक दल की 23 को होने वाली बैठक टाल दी गई है। फिर भी सोमवार को शिवराज का नाम तय हुआ। आनन-फानन में विधायक दल की बैठक हुई। उन्हें नेता चुना गया और रात में ही शपथ हो गई।
– क्यों लगी शिवराज के नाम पर मुहर
शिवराज सिंह चौहान को भाजपा में अपेक्षाकृत सबसे लोकप्रिय चेहरा माना जाता है। वे मेहनती हैं। 25 विधानसभा क्षेत्रों के उप चुनाव में जीत के लिए पार्टी को शिवराज जैसे नेता की जरूरत थी। नरेंद्र सिंह तोमर चंबल-ग्वालियर अंचल से हैं। प्रदेश अध्यक्ष बीडी शर्मा इसी क्षेत्र से आते हैं। दोनों सामान्य वर्ग से हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया का इस अंचल से केंद्र में मंत्री बनना तय है। ऐसे में भाजपा का समूचा शक्ति केंद्र चंबल-ग्वालियर अंचल बनने का खतरा था। खबर यह भी है कि सिंधिया नहीं चाहते थे कि तोमर मुख्यमंत्री बनें और उस अंचल में उनके मुकाबले एक और बड़ा नेता तैयार हो। गोपाल भार्गव, नरोत्तम मिश्रा भी सामान्य वर्ग से हैं जबकि शिवराज पिछड़े वर्ग से। लिहाजा, शिवराज बाजी मार ले गए।
– कोरोना से लड़ने थी अनुभवी की जरूरत
कोरोना देश के साथ मप्र के लिए भी महामारी के तौर पर सामने आया है। इससे लड़ने के लिए ऐसे मुख्यमंत्री की जरूरत थी, जिसकी प्रशासनिक अमले में मजबूत पकड़ हो। जो कोरोना को लेकर लिए गए निर्णयों पर अमल करा सके। शिवराज इस मायने में भी फिट साबित हुए। वे 13 साल तक प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं। उन्हें मालूम है कि कौन क्या कर सकता है। किसे क्या जवाबदारी दी जा सकती है। ऐसे कारणों की वजह से तोमर सहित सभी दावेदार पीछे रह गए और पार्टी नेतृत्व ने उनके नाम पर ठप्पा लगा दिया।
– डगर आसान नहीं, बहुत हैं चुनौतियां
शिवराज चौथी बार मुख्यमंत्री बन गए लेकिन डगर पहले जैसी आसान नहीं है। इस बार उनके सामने ढेरों चुनौतियां हैं। भाजपा के पास पहले जैसा बहुमत नहीं है, वह अल्पमत में है। सरकार का भविष्य 24-25 विधानसभा सीटों के उप चुनाव पर निर्भर है। विधानसभा चुनाव में भाजपा की शिकस्त का एक प्रमुख कारण कांग्रेस द्वारा किसानों से किया गया कर्जमाफी का वादा था। कांग्रेस सरकार किसानों का कर्ज माफ करने की दिशा में अग्रसर थी। सवाल यह है कि सत्ता में आने के बाद भाजपा किसान कर्जमाफी पर क्या स्टेंड लेगी। कर्जमाफी बंद होती है तो किसानों के नाराज होने का खतरा है। कर्जमाफी जारी रखी जाती है तो प्रदेश की आर्थिक स्थिति को ठीक करना मुश्किल होगा।
– इन समस्याओं से भी निबटना आसान नहीं
विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अतिथि विद्वानों एवं अतिथि शिक्षकों को नियमित करने का वचन दिया था। वचन पूरा न किए जाने के कारण ये लगभग तीन माह से भोपाल में आंदोलन कर रहे हैं। नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव, पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा के साथ शिवराज सिंह चौहान इन्हें नियमित करने की मांग कांग्रेस सरकार से करते रहे हैं। सवाल है कि शिवराज सरकार इस समस्या से कैसे निबटेगी। इससे भी बड़ी समस्या है बेरोजगारी। बेरोजगार रोजगार के लिए भटक रहे हैं। शिवराज सरकार पर आरोप था कि वे कर्ज लेकर सरकार चलाते थे। इसकी वजह से प्रदेश कर्ज में डूबा है। ऐसे में रोजगार के अवसर बढ़ाना शिवराज सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी।
– एक उप मुख्यमंत्री सहित 10 बागी बनेंगे मंत्री
चौथी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान एक सप्ताह में अपने मंत्रिमंडल का गठन करेंगे। शिवराज के लिए इस बार मंत्रियों का चयन करना कठिन होगा। बागियों के कारण भाजपा विधायकों को कम स्थान मिलेंगे। यह पहले से तय हो गया है कि कांग्रेस से बगावत करने वाले पूर्व विधायकों में कम से कम 10 को मंत्रिमंडल में जगह दी जाएगी। इनमें कांग्रेस सरकार में शामिल रहे 6 पूर्व विधायक मंत्री बनेंगे ही, 4 अन्य पूर्व विधायकों को भी स्थान मिलेगा। तुलसी सिलावट को उप मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है। इसके अलावा पूर्व मंत्री गोविंद सिंह राजपूत, प्रभुराम चौधरी, इमरती देवी, प्रद्युम्न सिंह तोमर, महेंद्र सिंह सिसोदिया का मंत्री बनना तय है। जिन वरिष्ठ विधायकों को कमलनाथ सरकार ने नजरअंदाज किया था, उनमें बिसाहूलाल सिंह, जयवर्धन सिंह दत्तीगांव, एंदल सिंह कंसाना एवं हरदीप सिंह डंग को भी मंत्रिमंडल में शामिल करने की चर्चा है। ऐसे में भाजपा के अंदर असंतोष भड़क सकता है।
– निर्दलीय, बसपा, सपा को भी जगह संभव
कमलनाथ सरकार जब से गिरी तब से ही समर्थन देने वाले विधायक भाजपा के संपर्क में हैं। पूर्व खनिज मंत्री निर्दलीय विधायक प्रदीप जायसवाल ने सबसे पहले भाजपा को समर्थन देने की घोषणा की थी। बसपा के संजीव सिंह एवं सपा के राजेश शुक्ला भी नरोत्तम मिश्रा के साथ भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व से मिल चुके हैं। निर्दलीय सुरेंद्र सिंह शेरा ने अपना मन बदला है। भाजपा इनका समर्थन लेकर दो-तीन को मंत्री बना सकती है। भाजपा अभी पूर्ण बहुमत में नहीं है। इसलिए उसे अन्य के समर्थन की जरूरत भी है।
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