जीजा के जाते ही साले की दुकान ठप्प ?

जीजा के जाते ही साले की दुकान ठप्प ?

साहब जैसा हो जोरू का गुलाम……?जीजा के जाते ही साले की दुकान हुई बंद………? कहते हैं की घरवाली बहुत ताकतवर होती है यह कोई हास्य व्यंग नहीं बल्कि उस अधिकारी की हकीकत है जो बेचारा टीकमगढ़ में रहते हुए जोरू का गुलाम बना रहा और अपने साले की सेवा में लगा रहा उसके मन में टीस थी कि कुछ इस जिले में करें लेकिन साले के मारे एक न चली उसने अपने साले को जहां स्वक्षता के तहत समग्र स्वच्छता अभियान में करोड़ों की कमाई कराई तो वही st ओर मिशन में जिले में संचालित छात्रावासों में पलंग गद्दा और दैनिक सामानों की सप्लाई करा दी जीजा रहे तो साले की बल्ले-बल्ले होती रही लेकिन जीजा के जाते ही साले की दुकान बंद हो गई ह……….ै नेताजी की भी रही बल्ले बल्ले ……… उस समय तत्कालीन ताकतवर नेता जी को भी साहब की कारगुजारी यों का पता था लेकिन साहब को तो नेताजी को घर बैठे बैठे कमीशन मिल जाता था और जब भी नेता जी को यह समस्या बताओ तो वह राजा हरिश्चंद्र की तरह अपने आप को ईमानदारी का चोला ओढ़कर लोगों को बताते थे यह नेता जी ज्यादा बड़बोले पन के कारण पतन की ओर चले गए……… बता दें आपको कि यह साले महोदय की एजेंसी छत्तीसगढ़ राज्य से थी और लेकिन आज उनके अधीनस्थ काम करने वाले आज भी एक दूसरे को कहते हैं जोरू का गुलाम हो तो साहब जैसा हो जो अपने साले के लिए तन मन धन और नियमों को दरकिनार कर समर्पित रहते थे साले का इशारा हुआ कि जीजा दौड़ लगाकर ऑफिस पहुंचते थे और उनके सप्लाई की व्यवस्था करते थे अब अधिकारी चैन की सांस ले रहे हैं जीजा साले का अंत हुआ निवाड़ी जिला बनने से पहले साले साहब ने किए थे करोड़ों के वारे वारे जी हां आपने सही सुना है अगर हम उनकी बात माने तो निश्चित ही जब टीकमगढ़ जिले का बंटवारा हो रहा था तो साहब की बल्ले-बल्ले हो रही थी और उनके साले ने खनिज के जितने भी बकाया काम थे उनको आनन-फानन में निपटाया । ऐसे में उन व्यापारियों के मसीहा बने साले साहब जिन्होंने खुलकर के जीजा के नाम पर खेला और अपनी जेब गर्म की। साहेब के अधीनस्थ कहते हैं भगवान हर किसी को इसी तरह जोरू का गुलाम बनाए बनाए और साले की बल्ले-बल्ले हो(यह कहानी कर्मचारियों की चर्चा पर आधारित है )

टीकमगढ़ ताजा खबर