10 साल में पुत्र बढ़ा पाया 191 मत
टीकमगढ़। जिले की राजनीति में वर्ष 2018 में एक ऐसा अध्याय लिखा गया। जिसमें 10 साल के दौरान 2 बार जिलाध्यक्ष रहते हुए पुत्र अपने पिता से मात्र 191 मतों का इजाफा कर पाया। राजनीति के जानकार कहते है कि पुत्र ने 2बार जिलाध्यक्ष के दौरान स्वंय को समाज में प्रस्तुत तो किया। लेकिन कार्यकर्ताओं से दूर रहे और उनकी समाज ने उनकों स्वीकार नही किया।
जी हां हम बात कर रहे है टीकमगढ़ जिले की राजनीति के सितारे रहे दादा अखण्ड प्रताप सिंह यादव की। जिन्होने इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद वर्ष 1966 में अपने पैतृक गांव जेवर में ग्रामपंचायत के पंच का चुनाव लड़ा था। इसके बाद उन्होने पीछे मुड़कर नही देखा। वर्ष 1977 में वह जतारा विधानसभा से विधायक चुने गए। इसके बाद वर्ष 1993 में पुनः जतारा विधानसभा से विधायक बने और दिग्गविजय सिंह सरकार में मंत्री बने। वर्ष 2003 में टीकमगढ़ विधानसभा से विधायक बने और कैबनिट मंत्री बने। लेकिन वर्ष 2008 में वह टीकमगढ़ विधानसभा से चुनाव लड़े और लगभग 10200 मत ही मिले। अखण्ड प्रताप सिंह यादव की जमानत जप्त हो गई। वर्ष 2018 में भाजपा ने अखण्ड प्रताप सिंह यादव के पुत्र अभय प्रताप सिंह यादव को पृथ्वीपुर विधानसभा से टिकिट दिया। लेकिन वह 10391 मत ही प्राप्त कर सके। पिछले 10 वर्ष के दौरान वह 2 बार से टीकमगढ़ भाजपा के जिलाध्यक्ष रहे है। इस तरह हम कह सकते है कि विरासत में मिली राजनीति में वर्ष 2008 में पिता अखण्ड प्रताप सिंह यादव को जहां लगभग 10200 मत मिले थे। वहीं पुत्र अभय प्रताप सिंह यादव को 10 वर्ष बाद 10391 मत प्राप्त हुए है। राजनीति के जानकार वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र अध्वर्यु कहते है कि पिता अखण्ड प्रताप सिंह यादव ने छोटे स्तर से राजनीति की शुरूआत की थी और आगे बढ़े थे। लेकिन पुत्र अभय प्रताप सिंह यादव 2 बार सत्तादल के जिलाध्यक्ष रहने के बाद भी कार्यकर्ताओं की टीम नही बना पाऐ। वहीं वह अपने यादव समाज से दूर रहे। टीकमगढ़ जिले की राजनीति में पिता-पुत्र का कोई विकास में योगदान भी नही है। वह कहते है कि चाहे अखण्ड प्रताप सिंह हो या अभय प्रताप सिंह इनकी यादव समाज में छवि अच्छी नही है। वहीं अखण्ड प्रताप सिंह यादव कहते है कि पुत्र अभय प्रताप सिंह यादव को पार्टी ने जो जिम्मेदारी दी थी। वो उसने निभाई है क्योकि बेटे ने पृथ्वीपुर विधानसभा से कभी टिकिट मांगा ही नही था। वहां पर भाजपा के कार्यकर्ताओं व पदाधिकारियों ने खुले आम समाजवादी पार्टी का काम किया है। जो जग जाहिर है। यहीं वजह है कि बेटे को हार का मुंह देखना पड़ा।

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