विशेष टिप्पणी:- महाराजा और राजा के बीच पिसती रही प्रदेश की जनता

अनुराग दीक्षित
टीकमगढ़। मध्यप्रदेश में राजनैतिक लड़ाई महाराजा और राजा के बीच थी और पिसती रही मध्यप्रदेश की जनता। अंत में महाराजा ने जीत हासिल कर ही ली और तमाशबीन बनी भाजपा मध्यप्रदेश में पुनः सत्ता में आकर राज करेगी। कांग्रेस सरकार के 15 माह होते ही सरकार ताश के पत्तो की तरह ढह गई। मध्यप्रदेश की सियासत में 17 दिनों तक पाॅलीटिकल ड्रामा चलता रहा। फ्लोर टेस्ट की बात चलती रही। अंत में भारतीय जनता पार्टी जो महाराजा ज्योतिरादित्स सिंधिया और राजा दिग्गविजय सिंह के बीच हो रहे युद्व को देख रही थी। अब वह सत्ता में आन बैठगी। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने फ्लोर टेस्ट के पहले ही इस्तीफा दे दिया। इस्तीफा के बाद भले ही भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं में खुशियां हो परंतु कांग्रेस के एक बहुत बड़े खेमे में भी खुशिया ही खुशियां दिखाई दे रही है। इस बात को अनदेखा करना बेईमानी होगी। महाराजा और राजा के बीच अस्तित्व की लड़ाई का खामियाजा समूचे मध्यप्रदेश की जनता भुगत रही है। परंतु इस जनता की फिकर करने वाला राजा अब राजा नही बचा।

ज्योतिरादित्य समझ गए दिग्गी राजा के मन की बात
मध्यप्रदेश में राजा और महराजा के बीच यह लड़ाई दशकों से चली आ रही है। जिसको महाराजा भले भांति शायद भाप चुके थे। यही वजह रही होगी कि महाराजा ने राजा पर विश्वास करना मुनासिब नही समझा और अपने समर्थित विधायकों को समझा बुझाकर बेगलुरू भेज दिया। मध्यप्रदेश में मंत्री रहे जीतू पटवारी और उसके बाद पूर्व मुख्यमंत्री दिग्गविजय सिंह ने काफी कुछ ड्रामा किया और बेंगलुरू में विधायकों को समझाने पहंुचे। परंतु इन विधायकों के वायरल हुए वीडियों से साफ जाहिर होता कि ये बातों में नही आऐ और दिग्गी राजा के प्रयास को झांसा बताया। यह लड़ाई समूचा मध्यप्रदेश सहित देश भी जानता है कि आखिर यह क्या हो रहा था। जिस कारण से समूचा मध्यप्रदेश का शासन का कार्य प्रभावित हो गया।

कांग्रेस में नही सुनी जाती कार्यकर्ताओं की
कांग्रेस पार्टी के ही कार्यकर्ताओं द्वारा व नेताओं द्वारा नाम न छापने की शर्त पर यह बताया गया कि कांग्रेस पार्टी के नेता अपने कार्यकर्ताओं की नही सुनते। जबकि कार्यकर्ताओं के बलबूते पर यह नेता विधायक और मंत्री बनते है। दुखी मन से कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने बताया कि कांग्रेस की सत्ता आते ही मध्यप्रदेश के यह मंत्री व नेता अपने-अपने व्यवसायों में जुट गए और कार्यकर्ताओं के छोटे काम भी नही हुए। मंत्रियों का साफ कहना होता था कि थोड़ा रूकों अभी नई-नई सरकार है, पटरी पर आ जाने दो, उसके बाद सभी कार्य होगें। परंतु सत्ता के 15 महीने होते ही यह सरकार पटरी से उतर गई। पिछले 10 वर्षो का वह कार्यकाल जब दिग्गविजय सिंह मुख्यमंत्री थे। उसके 15 वर्ष तक भाजपा का शासन रहा। फिर वमुश्किल कांग्रेस सत्ता में आई। परंतु 15 महीने में ऐसे गिर गई जैसे ताश के पत्तों का महल हो और अंधेर नगरी चैपट राजा जैसी कहानी लोगों के बीच सुनाई जा रही ।

सिंधिया की राय से बनेगा भाजपा का नया मुख्यमंत्री
मध्यप्रदेश की इस सियासत में मची हलचल के हीरो केवल ज्योतिरादित्य सिंधिया ही है। सिंधियां की ताकत और सिंधिया समर्थित विधायकों ने यह सिद्व कर दिखाया कि सत्ता उलट-पुलट कैसे होती हैं। वैसी भी मध्यप्रदेश की सरकार वैशाखियों के सहारे थी। वैशाखी टूटी और 17 दिन तक पाॅलीटिकल ड्रामा के साथ यह वैंट्रीलेंटर पर रही। अब नए मुख्यमंत्री की तलाश है। किसी के मुख से पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान का नाम लिया जा रहा है तो वही बीडी शर्मा सहित नरेन्द्र सिंह तोमर का। लेकिन राजनैतिक गलियारों में यह चर्चा है कि सीएम कोई भी बने वह सिंधियां की राय से ही बनाया जाएगा या सिंधिया को भी सीएम बनाया जा सकता है। यह तो वक्त बताऐगा।

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