जिस परिवार से खूनी रंजिश हो वहाँ भला कौन नौकरी मांगने जाएगा !
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असलियत सामने लाने को सीबीआई को भी कई तहों तक जाना होगा
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डॉ॰ राकेश द्विवेदी ( बुंदेलखंड डेस्क )

उन्नाव के माखी कांड के आरोपित भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर का बड़ा खास रिश्ता जालौन जिले से भी है । उनके पूर्वज तो यहीं के थे जो करीब 100 वर्ष पहले फतेहपुर चले गए थे । यह खानदान तरसौर खानदान कहलाता है , जो बाद मेँ शेखपुर बुजुर्ग आकर बस गया । इसी खानदान के कर्नल ईश्वरी सिंह सेंगर थे । इसी खानदान से पूर्व विधायक संतराम सेंगर और सतीश सेंगर का भी सरोकार जुड़ा है ।

कुलदीप सेंगर के बाबा थे – शिवराज सिंह सेंगर । कानपुर के नया गंज मेँ सराफा का व्यापार करने से वह शिवराज सर्राफ के नाम से प्रसिद्ध रहे । उनके मुलायम सिंह सेंगर , गुलाब सिंह सेंगर सहित तीन पुत्र थे । मुलायम सिंह सेंगर की ही शादी माखी गाँव मेँ वीरेंद्र सिंह चौहान उर्फ बाबू सिंह की बड़ी पुत्री चिन्नी देवी ( चुन्नी ) के साथ हुई थी । बाबू सिंह उस क्षेत्र के सबसे बड़े जमींदार थे। ससुर की संपत्ति मिलने से मुलायम सिंह कानपुर का व्यापार छोड़कर माखी आ गए । पति के निधन के बाद चिन्नी देवी राजनीति में उतर आईं । वह जिला पंचायत सदस्य के अलावा लगातार दो बार प्रधान भी रहीं । वह जब दूसरी बार प्रधान थीं तब 2014 मेँ उनका निधन हो गया । त्रयोदशी में अखिलेश यादव , शिवपाल यादव भी शामिल हुए थे । तभी माखी को विकास खंड बनाने का निर्णय भी लिया गया था ।

विवाद की कुछ वजहें
“““““““““““` विवाद की तह में यदि जाया जाये तो कुछ खास कारण जुड़े हुए हैं । यह गाँव चौहानों का है । विधायक के नाना भी चौहान ही थे । वह जमीदार थे । उनकी संपत्ति का हक जब कुलदीप सेंगर के परिवार को मिला तो गाँव के कई चौहानों को मन नहीं भाया । उन्हीं मेँ से महेश चौहान का परिवार भी था । गाँव की चल – अचल संपत्ति बाहरी व्यक्ति के हाथों चली जाना भी खल गया । इसके बाद महेश सिंह का परिवार मुखर हुआ । धन में कमजोर पड़ने के बावजूद राजनीतिक क्षेत्र मेँ बराबरी करने की कोशिश आरंभ हो गई । दूरियाँ तो पहले से बनने लगी थीं पर 2000 के प्रधानी चुनाव में यह खुलकर सामने आ गई । इस चुनाव मेँ कुलदीप की माँ चिन्नी देवी चुनाव मेँ खड़ी हुई और सामने प्रतिद्वंदी शिशुपाल सिंह की पत्नी थीं । इस चुनाव मेँ महेश और उनके भाइयों ने शिशुपाल का समर्थन किया । चुनाव तो चिन्नी देवी जीतीं पर गोलीबारी से तनाव बहुत ज्यादा हो गया । बताया जाता है कि महेश अपने भाइयों के साथ असलहों के साथ आए थे । कुलदीप के भाई अतुल पर फायर किए जाने से इसका मुकदमा भी लिखवाया गया । इसी के बाद रंजिश खुलकर सामने आ गई । उधर कुलदीप के भी राजनीतिक स्वार्थ विस्तारित होने लगे । किसी को राजनीति मेँ आगे न आने देने की कूटिनीति से क्षेत्र मेँ उनके विरुद्ध भी खेमेबंदी आरंभ हो गई ।

विधायक के पास कौन सी नौकरी मांगने गई थी पीड़िता
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कई सारे ऐसे प्रश्न हैं जिनकी जांच सीबीआई को करनी है । मीडिया भी इस प्रकरण मेँ अति सजग है । उसके अति हस्तक्षेप से अदालत और पुलिस दोनों पर दबाव भी दिखा । अब पांचों मुकदमों को सुप्रीमकोर्ट देखेगी । सीबीआई की जांच के दायरे में जो प्रमुख बिन्दु होगा , वह यह जरूर रह सकता है कि जब पीड़ित लड़की नाबालिग है तो फिर वह विधायक के यहाँ रात में कौन सी नौकरी मांगने गई थी ? क्या ऐसा संभव है कि जिस परिवार के साथ इतने तीखे और तनाव भरे संबंध चल रहे हों , उसके यहाँ नौकरी मांगने की हिम्मत जुटाई जाये ? क्या कोई परिवार इसकी कभी इजाजत देगा ? फिर विधायक के यहाँ ऐसा कौन सा व्यापार है , जहां उसके मतलब की कोई नौकरी थी ।
पीड़ित लड़की का आरोप है कि 11 जून 2017 को रात 9 बजे वह नौकरी की तलाश मेँ शुभम के साथ गाड़ी पर निकली । गाड़ी को अवधेश तिवारी ड्राइव कर रहा था । दोनों ने उसके साथ बारी – बारी से अमर्यादित व्यवहार किया । पिता की तहरीर पर मामला पंजीकृत कर विवेचना आरंभ हुई । न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष लड़की 164 के तहत बयान दर्ज कराती है । इसके बाद सभी अभियुक्तों – शुभम सिंह , अवधेश तिवारी , ब्रजेश यादव को गिरफ्तार कर जेल भेजा जाता है ।
दो महीने बाद अर्थात 17 अगस्त 2017 को पीड़िता को यह याद कैसे आता है कि 11 जून से एक हफ्ता पहले 4 जून 2017 को भी ऐसा दुर्व्यहार हुआ था , जब विधायक कुलदीप सेंगर के यहाँ रात मेँ नौकरी के लिए गई थी । लड़की का सीधा विधायक पर आरोप था । सवाल यह उठता है कि 22 जून 2017 को जब पीड़िता की तरफ से ज्युडीशियल मजिस्ट्रेट के सामने 164 के तहत जो बयान दर्ज कराये गए थे , तब किस कारण कुलदीप सेंगर का नाम नहीं लिया था । आखिर इतनी बड़ी चूक कैसे हो गई ?

महेश पर भी हैं कई तरह के आरोप
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ कुलदीप सेंगर से जिस महेश सिंह की करीब 20 वर्षों से अदावत चली आ रही है , उस परिवार का अतीत भी कई आरोपों से घिरा हुआ बताया जाता है । गुड्डू सिंह , पप्पू सिंह और महेश सिंह तीन भाई थे । पुलिस की नजर में तीनों भाई अपराधी रहे हैं। जो पीड़िता है वह पप्पू सिंह की ही बेटी है । 2000 में चुनावी झगड़े के बाद महेश फरार होकर दिल्ली रहने लगा था । बताया जाता है कि वहाँ उसके एक शातिर अपराधी से संपर्क हुआ , जिसके कारण उसकी गतिविधियां कई गलत दिशा की ओर भी मुड़ीं । एक लड़की के पिता ने भय खाकर तार बनाने वाली तीन मशीने उसे दी , जिससे उसकी आमदनी में इजाफा हुआ । सुल्तानपुर की बड़ेरिया जाति की महिला से उसका विवाह हुआ । उन पर आरोप तो यहां तक है कि दोनों ने मिलकर दिल्ली में नाजायज धंधे में लड़कियों को भेजने में दिलचस्पी ली। यह उनकी कमाई के विस्तारीकरण का मुख्य उद्देश्य माना गया। ट्रक – कार हादसे में मरने वालों में महेश की पत्नी पुष्पा भी हैं । महेश अब अकेले बचे हैं । ग्रामीणों के साथ झगड़े में गुड्डू सिंह की हत्या हुई थी । कहा तो यह भी जाता है कि असल मेँ गुड्डू सिंह को इनकाउंटर में मारा गया था । जबकि पप्पू सिंह की जान 5 अप्रैल को कुलदीप की आदमियों के साथ हुए झगड़े के बाद आई चोटों से 9 अप्रैल को चली गई । इस सारे फसाद को लेकर एक आरोप यह भी उभरा है कि विधायक तगड़े ढंग से चक्रव्यूह में फँसाने के लिए दुष्कर्म के आरोपों को और प्रभावी बनाने को पीड़िता को नाबालिग सिद्ध करने के कागजात बनवाए गए थे।
कुल मिलाकर अपने नाना की विरासत पर राजनीति चमकाने का जो ख्वाब कुलदीप ने सँजोया था वह उनकी दबंगई भरी राजनीति के कारण उनको कालजयी नहीं रख पाई ।वे विरोधियों को अभी तक पटखनी देते रहे पर इस बार खुद विरोधियों से जबरजस्त मात खा बैठे । फिर उनके दोनों भाइयों मनोज और अतुल का आतंक और अन्याय भरा व्यवहार भी लोगों को खलने लगा था । ये सब ऐसे कारण रहे जो विधायक के सामने परेशानी का सबब बनकर उभरे । कोर्ट के तेवर भी सख्त दिख रहे हैं । हालांकि उनके परिवार को विश्वास है पीड़िता के सभी आरोप गलत हैं , और अदालत से उन्हें न्याय मिलने की पूरी उम्मीद है ।

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