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लॉक डाउन और मजदूर पार्ट 4 ;-नींद आएगी कैसे

बुंदेलखंड में लॉक डाउन और मजदूर पार्ट 4……………………………नींद आएगी भला कैसे उसे शाम के बाद
रोटियां भी न मयस्सर हों जिसे काम के बाद ……अजहर इकबाल
-………(डॉ नरेंद्र अरजरिया )…… ………………………… बेबसी और मुफलिसी यह दो शब्द है जो इंसान को शैतानी की ओर ले जाते हैं? इन दो शब्दों के पीछे जुड़ा होता है शासकीय योजनाओं का क्रियान्वयन , अधिकारियों की उदासीनता और समाज की उपेक्षा ।जब इंसान लंबे समय तक इन तीन आवश्यकताओं से दूर हो जाता है तो उसके अंदर एकांकी पन का भाव आ जाता है फिर वह समाज से निडर और क्रूर मानसिकता का हो सकता है समय रहते प्रशासनिक व समाजिक अमले ने इस समाज की और ध्यान नहीं दिया तो लॉक डाउन में इस समाज के मजदूर भी कुछ ऐसे ही नजर आ सकते है जब उनके पास कुछ नहीं होगा तो निश्चित ही उस राह पर चल देंगे जिसकी कल्पना ना तो समाज करता है ना ही प्रशासन ना ही उन्हें संविधान इजाजत देता है? लेकिन मजबूरी जो न कराए वह कम है ………बुंदेलखंड के टीकमगढ़ जनपद के बड़ागांव और मोहनगढ़ क्षेत्र में आदिवासी मजदूरों के लॉक डाउन के बाद यही हालात हैं जिसकी चिंता ना तो समाज को है और ना ही प्रशासन मैं बैठे अधिकारियों के लोह पंजो को ।
भारत और मध्य प्रदेश सरकार की करीब 45 जनकल्याणकारी योजनाएं इस समाज के लिए संचालित हैं जिसमें उनके जन्म से लेकर रोजगार और मृत्यु तक की गारंटी दी गई है लेकिन ये योजनाएं शासन की डायरी और अधिकारियों की फाइलों में जरूर पढने पर अच्छी लगती हैं यह हकीकत की बानगी है जो तस्वीरों में नजर आ रही है लॉक डाउन हुए करीब 25 दिन गुजर गए हैं जिनका जीवन रोज कमाकर रोज खाने का हो उन्होंने 25 दिन कैसे गुजारे होंगे यह तो बखूबी वह खुद स्वयं बयान कर सकते हैं और आप अंदाजा लगा सकते हैं अगर आप इनकी बस्ती और घरौंदो को देखेंगे तो शायद आपके रोंगटे खड़े हो जाएं शहरों तक सिमटी समाजसेवियों की फौज भी इन तक पहुंचने में महफूज है ना तो अब उनके घर में चूल्हा जलता है ना ही पेट के लिए रोटी सेकी जाती है तो फिर आपका जवाब होगा कि यह आदिवासी समाज अपना पेट कैसे भर्ती है आप तस्वीरों को देखेंगे तो आपको खुद समझ आ जाएगा जिस अनाज को लोग अपने जानवरों को खिलाते हैं वही अनाज अब इनकी पेट की आग बुझा रहा है कहीं तो हालात यह हैं कि वह बेरी के बेर और आलू ऊपर आश्रित हैं जिन्हें उबाल करके अपना पेट भर लेते हैं और खो जाते हैं अपनी जिंदगी की उधेड़बुन में …………बदलती आंचलिक पत्रकारिता……………. सोशल मीडिया के आने के बाद अब आंचलिक पत्रकारिता का स्वरूप भी बदलने लगा है जिस पत्रकारिता का उद्देश्य शासन और सत्ता से दूर बैठे व्यक्तियों की समस्या उठाने के लिए होता था लेकिन सोशल मीडिया के आने के बाद वह चाटुकारिता और जनसंपर्क में व्यस्त है यूट्यूब चैनल वेबसाइट और सोशल मीडिया के तमाम प्लेटफार्म होने छोटी-छोटी जगहों पर ऐसे पत्रकार तैयार कर दिए हैं जो सिर्फ अधिकारी और नेताओं की चापलूसी के किस्से दिनभर उस पर लिखते हैं और अपने अधिकारियों और नेताओं को पढ़ा करके स्वयं खुश होते हैं और वह भी खुश होते हैं लेकिन समाज की ऐसी गंभीर समस्याएं शायद अब आंचलिक पत्रकारिता मैं कम ही देखने को मिलती हैं पहले इसी पत्रकारिता की दम पर प्रादेशिक और राष्ट्रीय सुर्खियां बनती थी । …………अधिकारियों के लोहपंजो के सामने दम तोड़ती शासकीय योजनाएं…………… वातानुकूलित कमरों से बनकर निकली विकास की योजनाओं का हश्र बुंदेलखंड में पहले से ही मिलता रहा है लेकिन लॉक डाउन में इनकी हालत और खस्ता हो गई है जनता के नुमाइंदे हाथों को सैनिटाइजर करके घर में बैठे हैं वहीं प्रशासनिक अधिकारी कोरोना के डर से कार के नीचे नहीं उतर रहे हैं ऐसे में बस टूट रहा है तो वह है मजदूर जिसे अपनी जिंदगी से ज्यादा भूख की चिंता है बेशर्मी लादकर प्रशासन का संचालन करने वाली अधिकारी कहते हैं कि मुझे मालूम नहीं है जबकि इन अधिकारी महोदय से आदिवासी बस्ती की दूरी मात्र आधा किलो मीटर से भी कम है जनाब फरमाते हैं कि मैं सीएमओ को बोलकर उन तक राशन पहुंचाता हूं लॉक डाउन को 25 दिन हो गए हैं और साहब को अपने आधा किलोमीटर के आसपास की जानकारी नहीं है अब आप इससे अंदाजा लगा सकते हैं कि अधिकारी अपने कर्तव्य का कितना संजीदगी से निर्वहन कर रहे है? मजदूरों की हालत पर मुझे चार लाइन याद आती है ……………………………… देखना है और कितना इम्तिहान लेगी ज़िन्दगी
कश्मकश है दिल में लेकिन हिम्मत नहीं हारी है
तमाम बीमारियां भी कुछ नहीं इसके सामने
यहां गरीब पैदा होना ही सबसे बड़ी बीमारी है

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