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महिला दिबस पर बिशेष:- कमिश्नर के साथ घूघट डाले बैठी रही महिला सरपंच ।

महिला दिवस पर विषेष:-

कमिष्नर के बगल में घूघंट डाले बैठी रही महिला सरपंच
टीकमगढ़,महिला दिवस पर भारत और मध्यप्रदेष सरकार भले ही महिलाओं के विकास के लिए लाख दावे कर ले। लेकिन बुदेलखण्ड में इसकी तस्वीर अलग ही है। जिला मुख्यालय से लगे गांव बड़ागांव खुर्द में कल सागर कमिष्नर मनोहर दुबे ने जनसमस्या निवारण चैपाल का आयोजन किया था। कमिष्नर के बगल में बड़ागांव की महिला सरपंच लाड़लीबाई कुम्हार बैठाया गया। लेकिन लम्बे समय तक चले इस कार्यक्रम में सरपंच जैसे पद पर आसीन महिला घूघंट डाले कमिष्नर के बगल में बैठी रही। पंचायत अधिनियम में महिलाओं की भीगीदारी बढ़ाने एवं उन्हैं घर की चार दीवारी से बाहर निकालने के लिए शासन प्रयास करें। लेकिन इसकी सबसे बड़ी बानगी कमिष्नर की चैपाल से सिद्व हो जाती है कि बुन्देलखण्ड में महिलाऐं आज भी पद पर आसीन होने के बाद भी दोयम दर्जे का जीवन जीने को विवष है। जिसके हाथ में एक गांव की बागडोर है वह महिला कमिष्नर के सामने भी बोलना तो दूर घूघंट से बाहर नही आ सकी और चुपचाप करीब 3 घंटे तक बैठी रही।

सरपंच पद पर सवाल
जिन अधिकारियों के कंधे पर महिलाओं को सषक्तिकरण और उनके अधिकार दिलाने का दायित्व है वहीं अधिकारी जब अपने ही सामने सारी घटना देखते रहे तो इसे क्या कहा जाएगा ? यहां पर सवाल यह खड़ा होता है कि महिला सरपंच रबर स्टैम्प की तरह है । निष्चित ही इस महिला की जगह उसका पति सरपंची का कार्य करता होगा। सागर कमिष्नर के साथ-साथ कलेक्टर और जिला प्रषासन के अधिकारियों ने भी इस बात की हिम्मत नही जुटाई कि एक महिला सरपंच घूघंट में क्यों बैठी है।

समाजिक कार्यकर्ता मनोज बाबू चैबे कहते है कि बुन्देलखण्ड में पर्दा प्रथा महिलाओं के सषक्तिकरण के सामाजिक बेड़िया है। बिना इसकों तोड़े महिला पुरूषों की बराबरी नही कर सकती है यह उसका हक एवं अधिकार है कि वह समाज मंे मुख्यधारा में आने के लिए घूघंट प्रथा से निजात पाऐ। इसलिए प्रषासन और समाज दोनो ंके प्रयास आरक्षण के बाबजूद भी ना काफी है। ………सागर कमिश्नर मनोहर दुबे कहते हैं कि वह पहले आने को तैयार नहीं थी कम से कम वह आई और बैठी रही इस पर हम क्या कह सकते हैं
इस पूरी घटना पर मुझे दो पंक्तियां याद आती है………………….
दरिया की कसम, मौजों की कसम।
ये ताना-वाना बदलेगा।
तू खुद को बदल, तब ही तो जमाना बदलेगा।।

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