Views: 254

एक गाँव ऐसा जहाँ 50 की उम्र पार नही कर पाते पुरुष

पन्ना जिले का मनोर गांव जहां 50 साल से ज्यादा नहीं जीते पुरुष

पन्ना। बुन्देलखण्ड क्षेत्र के पन्ना जिले में एक गांव ऐसा है जहां पुरुषों की औसत उम्र 50 वर्ष से भी कम है। इस गांव में ज्यादातर पुरुष असमय ही काल कवलित हो जाते हैं, 50 वर्ष से अधिक उम्र का पुरुष यहां खोजने पर भी नहीं मिलता। गांव का सबसे बुजुर्ग व्यक्ति सूरज दयाल गौड है जिसकी उम्र लगभग 53 वर्ष है। यहां अधिकांश पुरुष सिलीकोसिस जैसी जानलेवा बीमारी से ग्रसित हैं, जिसके कारण मेहनत व मजदूरी करने में अक्षम हैं। गांव के तकरीबन 40 फीसदी पुरुष इस खतरनाक बीमारी की चपेट में हैं। पुरुषों के असमय काल कवलित होने के कारण इस अभागे गांव में विधवा महिलाओं की भरमार
है। गांव में कई महिलायें तो ऐसी भी हैं, जिनका 30-35 वर्ष की उम्र में ही सुहाग उजड़ गया, ऐसी स्थिति में बच्चों व परिवार के भरण पोषण का भार उन्हीं के ऊपर है।
उल्लेखनीय है कि पन्ना जिला मुख्यालय से महज 7 किमी की दूरी पर आपदाओं से ग्रसित यह गांव मनौर गुडियाना स्थित है। तकरीबन 7 सौ की आबादी वाले
इस छोटे से गांव में गरीबी का गहरा दर्द छिपा है। यहां जाकर ऐसा प्रतीत होता है कि गरीबी, भुखमरी और बीमारी इस गांव के आदिवासियों की नियति बन चुकी है। परम्परागत रूप से मनौर गुडियाना गांव के पुरुष पत्थर
की खदानों में काम करते रहे हैं, उनकी आजीविका का यह साधन ही उनके लिए अभिशाप साबित हुआ है। पत्थर की खदानों में 5-10 साल तक लगातार काम
करने वाले पुरुष जानलेवा बीमारी सिलीकोसिस के शिकार हो गये हैं, जिसके चलते उनकी कार्यक्षमता जहां पूरी तरह से खत्म हो गई है वहीं वे धीरे-धीरे मौत की ओर अग्रसर हो रहे हैं। सिलीकोसिस पीडि़त गांव के आदिवासियों का सही व समय पर इलाज न होने के कारण 50 वर्ष की उम्र तक
पहुंचने से पहले ही ज्यादातर पुरुषों की मौत हो जाती है। यही वजह है कि मनौर गुडियाना गांव में विधवा महिलाओं की संख्या तुलनात्मक रूप
से बहुत अधिक है। ग्रामीणों के मुताबिक मौजूदा समय इस छोटे से गांव में 30 से अधिक विधवा महिलायें हैं जो अपने व परिवार के भरण पोषण हेतु संघर्ष कर रही हैं।

जंगल बना आजीविका का सहारा

खेती-किसानी न होने तथा रोजी-रोजगार के अभाव में गांव के आदिवासियों का एकमात्र सहारा जंगल है। आदिवासी महिïलायें जंगल से जलाऊ लकड़ी लाती
हैं जिसे 7 किमी. दूर पन्ना ले जाकर बेंचती हैं। लकड़ी बेंचने से जो भी पैसा मिलता है उसी से पूरे परिवार का भरण पोषण होता है। गांव के कुछ युवक जो पत्थर खदानों में काम नहीं करते वे काम की तलाश में महानगरों
की तरफ पलायन कर जाते हैं। ऐसी स्थिति में शारीरिक रूप से अक्षम व मेहनत मजदूरी करने में असमर्थ पुरुष ही गांव में रहते हैं, जबकि महिलायें पूरे दिन मेहनत करती हैं। महिलाओं का ज्यादा वक्त जंगल में गुजरता है, वे पत्थर खदान के प्रदूषण से दूर रहती हैं, यही वजह है
कि पुरुषों के मुकाबले वे अधिक वर्षों तक जीवित रहती हैं।

गांव में स्कूल लेकिन बच्चे नहीं जाते पढऩे

मनौर गुडयाना गांव में शासकीय शाला है जरूर लेकिन गांव के बच्चे यहां पढऩे नहीं जाते। स्कूल की हालत देखकर ही लगता है कि यहां किसी तरह की कोई गतिविधि नहीं होती। गांव की आदिवासी महिला दुजिया बाई व हल्की बाई ने बताया कि वे बच्चों को स्कूल इसलिए नहीं भेज पाते क्योंकि सुबह लकड़ी लेने जंगल निकल जाते हैं। लकड़ी लेकर जब तक जंगल से वापस घर लौटते हैं तब तक स्कूल का समय निकल चुका होता है। हïल्की बाई ने बताया कि 30
वर्ष की उम्र में ही उसके पति रामप्रसाद की मौत सिलीकोसिस के कारण हो गई, मेरे चार बच्चे हैं जिन्हें पालने की जबावदारी मेरे ऊपर है। इस विधवा महिïला ने बताया कि जंगल ही हïमारी आजीविका के सहारा हैं।

सिलीकोसिस के उपचार की नहीं है कोई व्यवस्था

जानलेवा सिलीकोसिस की बीमारी का प्रकोप अकेले मनौर गुडयाना में नहीं अपितु पन्ना जिले के उन सभी इलाकों में है जहां पत्थर की खदानें चलती
हैं। जिले में रोजी-रोजगार के कोई अन्य साधन व अवसर न होने के कारण गरीब आदिवासी पत्थर खदानों में काम करने को मजबूर होते हैं। पत्थर काटने व तोडऩे में उसकी डस्ट धीरे-धीरे श्वॉस नली में फेफड़ों तक पहुँच
जाती है। यही डस्ट 5-6 सालों में खदान के कारीगर व मजदूर को बेवश और लाचार बना देती है। जिले में सिलीकोसिस पीडि़त मरीजों की संख्या काफी
होने के बावजूद यहां पर उनके इलाज की कोई माकूल व्यवस्था नहीं है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *